खोरासानी इमली,

 


खोरासानी इमली, जिसे स्थानीय भाषा में 'अदालती इमली' या 'बाओबाब' (Baobab) के नाम से भी जाना जाता है, मध्य प्रदेश की जैव-विविधता का एक अनमोल और अद्भुत हिस्सा है। यह वृक्ष न केवल अपनी विशालता के लिए, बल्कि अपने ऐतिहासिक और औषधीय महत्व के लिए भी प्रसिद्ध है।

यहाँ मध्य प्रदेश के संदर्भ में खोरासानी इमली पर एक विस्तृत लेख प्रस्तुत है:

खोरासानी इमली: मध्य प्रदेश का प्राचीन विरासत वृक्ष

मध्य प्रदेश के धार जिले में स्थित ऐतिहासिक नगरी मांडू (Mandu) को खोरासानी इमली का गढ़ माना जाता है। यहाँ के परिदृश्य में ये विशालकाय वृक्ष सदियों से खड़े हैं, जो अपनी अजीबोगरीब बनावट के कारण पर्यटकों के आकर्षण का केंद्र बने रहते हैं।

1. ऐतिहासिक संबंध: अफ्रीका से मांडू तक का सफर

माना जाता है कि खोरासानी इमली का मूल स्थान अफ्रीका है। इतिहासकारों के अनुसार, 14वीं और 15वीं शताब्दी के दौरान मांडू के सुल्तानों और व्यापारिक संबंध रखने वाले अरब यात्रियों द्वारा इसे भारत लाया गया था। 'खोरासानी' नाम संभवतः ईरान के 'खोरासान' क्षेत्र से आया है, जहाँ से होकर ये बीज यहाँ पहुंचे होंगे।

2. वृक्ष की विशेषताएँ

खोरासानी इमली सामान्य पेड़ों से काफी भिन्न होती है:

विशाल तना: इसका तना बहुत मोटा और फूला हुआ होता है, जो हजारों लीटर पानी जमा करने की क्षमता रखता है।

लंबी आयु: ये पेड़ 1000 से 2000 वर्ष तक जीवित रह सकते हैं।

फल: इसके फल मखमली खोल वाले होते हैं। फल के अंदर का गूदा सूखा और खट्टा-मीठा होता है।

3. मध्य प्रदेश में धार्मिक और सांस्कृतिक महत्व

मांडू और आसपास के आदिवासी क्षेत्रों में इस पेड़ को विशेष सम्मान दिया जाता है। स्थानीय लोग इसे 'कल्पवृक्ष' की संज्ञा देते हैं। आदिवासियों के लिए यह न केवल भोजन का स्रोत है, बल्कि इसकी छाल और पत्तियों का उपयोग पारंपरिक चिकित्सा में भी किया जाता है।

4. औषधीय और पोषण संबंधी लाभ

मध्य प्रदेश के स्थानीय बाजारों में खोरासानी इमली का उपयोग कई स्वास्थ्य लाभों के लिए किया जाता है:

विटामिन-सी का भंडार: इसमें संतरे से भी अधिक विटामिन-सी पाया जाता है।

पाचन तंत्र: इसके गूदे का शरबत पेट की गर्मी और पाचन संबंधी समस्याओं में रामबाण माना जाता है।

रोग प्रतिरोधक क्षमता: यह इम्यून सिस्टम को मजबूत करने में सहायक है।

5. संरक्षण के प्रयास

हाल के वर्षों में, इन दुर्लभ वृक्षों की संख्या में गिरावट देखी गई है। मध्य प्रदेश सरकार और वन विभाग ने मांडू के इन 'विरासत वृक्षों' के संरक्षण के लिए विशेष कदम उठाए हैं। इन्हें जीआई टैग (GI Tag) दिलाने की दिशा में भी चर्चाएं होती रही हैं ताकि इस अनूठी पहचान को वैश्विक स्तर पर सुरक्षित किया जा सके।

रोचक तथ्य: क्या आप जानते हैं कि मांडू के लोग खोरासानी इमली के गूदे को गुड़ के साथ मिलाकर एक विशेष चटनी बनाते हैं, जो पर्यटकों के बीच काफी लोकप्रिय है?


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