खुदीराम बोस - Biography

 


भारत के स्वतंत्रता संग्राम के इतिहास में खुदीराम बोस एक ऐसा नाम है, जो वीरता, त्याग और कम उम्र में मातृभूमि के लिए मर-मिटने के जज्बे का प्रतीक है। मात्र 18 साल की उम्र में फांसी के फंदे को चूमने वाले इस किशोर क्रांतिकारी ने सोए हुए भारत को जगाने का काम किया था।

यहाँ खुदीराम बोस के जीवन, उनके संघर्ष और उनके बलिदान का विस्तृत विवरण दिया गया है:

1. जन्म और प्रारंभिक जीवन

खुदीराम बोस का जन्म 3 दिसंबर, 1889 को पश्चिम बंगाल के मिदनापुर जिले के हबीबपुर गाँव में हुआ था। उनके पिता का नाम त्रैलोक्यनाथ बोस और माता का नाम लक्ष्मीप्रिया देवी था।

उनके जन्म के समय उनके परिवार में एक अजीब-सी परंपरा निभाई गई। उनके माता-पिता की पहले की संतानें जीवित नहीं रही थीं, इसलिए खुदीराम के जन्म के बाद उनकी बड़ी बहन ने उन्हें प्रतीकात्मक रूप से तीन मुट्ठी खुदी (चावल के कण) देकर खरीदा था, ताकि उन्हें बुरी नजर न लगे। इसी 'खुदी' के कारण उनका नाम खुदीराम पड़ा।

बचपन में ही उन्होंने अपने माता-पिता को खो दिया, जिसके बाद उनकी बड़ी बहन अपरूपा देवी ने उनका पालन-पोषण किया।

2. क्रांतिकारी विचारधारा का उदय

खुदीराम बोस का बचपन उस दौर में बीता जब बंगाल में ब्रिटिश विरोधी लहर तेज हो रही थी। 1905 के बंगाल विभाजन ने उन्हें अंदर तक हिला दिया।

राजनीतिक चेतना: वे सत्येन बोस के नेतृत्व में सक्रिय हुए और 'युगांतर' जैसी क्रांतिकारी संस्थाओं से जुड़ गए।

शिक्षा छोड़ना: नौवीं कक्षा में पढ़ते समय ही उन्होंने स्कूल छोड़ दिया और पूरी तरह से आजादी की लड़ाई में कूद पड़े।

पहली गिरफ्तारी: 1906 में एक औद्योगिक प्रदर्शनी के दौरान वे क्रांतिकारी पर्चे बाँटते हुए पकड़े गए, लेकिन वे पुलिस को चकमा देकर भागने में सफल रहे।

3. मुजफ्फरपुर कांड: किंग्सफोर्ड की हत्या का प्रयास

इतिहास में खुदीराम बोस का नाम सबसे प्रमुखता से मुजफ्फरपुर बम कांड के लिए जाना जाता है। उस समय कलकत्ता का प्रेसीडेंसी मजिस्ट्रेट किंग्सफोर्ड क्रांतिकारियों को बहुत क्रूर सजाएं सुनाने के लिए बदनाम था। क्रांतिकारी दल ने उसे खत्म करने का फैसला किया।

मिशन की शुरुआत

इस खतरनाक मिशन के लिए खुदीराम बोस और प्रफुल्ल चाकी को चुना गया। दोनों को बम और पिस्तौल देकर मुजफ्फरपुर भेजा गया। उन्होंने कई दिनों तक किंग्सफोर्ड की दिनचर्या का बारीकी से अध्ययन किया।

30 अप्रैल, 1908 की रात

रात के अंधेरे में, किंग्सफोर्ड की बग्घी समझकर खुदीराम और प्रफुल्ल ने यूरोपीय क्लब के बाहर एक गाड़ी पर बम फेंक दिया। लेकिन किस्मत से उस दिन किंग्सफोर्ड उस बग्घी में नहीं था। उस गाड़ी में मिसेज कैनेडी और उनकी बेटी सवार थीं, जिनकी मौत हो गई।

4. गिरफ्तारी और शहादत

बम फेंकने के बाद दोनों क्रांतिकारी वहां से भाग निकले। खुदीराम बोस ने नंगे पैर लगभग 25 मील की दूरी तय की और वैनी रेलवे स्टेशन (अब खुदीराम बोस पूसा स्टेशन) पहुंचे।

गिरफ्तारी: स्टेशन पर चाय पीते समय पुलिस को उन पर शक हुआ। तलाशी लेने पर उनके पास से रिवॉल्वर और कारतूस मिले। 1 मई 1908 को उन्हें गिरफ्तार कर लिया गया।

प्रफुल्ल चाकी का अंत: दूसरी ओर, प्रफुल्ल चाकी ने पुलिस के हाथों पकड़े जाने के बजाय खुद को गोली मारकर शहादत दे दी।

मुकदमा: खुदीराम पर मुकदमा चला। उन्होंने अदालत में निडर होकर अपना अपराध स्वीकार किया और कहा कि उन्होंने जो किया, वह देश की आजादी के लिए था।

5. फांसी का फंदा और विरासत

11 अगस्त, 1908 की सुबह, मुजफ्फरपुर जेल में खुदीराम बोस को फांसी दी गई। फांसी के समय उनके चेहरे पर कोई डर नहीं था, बल्कि वे हाथ में गीता लेकर मुस्कुराते हुए सूली पर चढ़ गए।

प्रभाव और विरासत

खुदीराम की शहादत ने पूरे बंगाल और भारत में क्रांति की एक नई लहर पैदा कर दी।

धोती की लोकप्रियता: उस समय बंगाल के बुनकरों ने एक विशेष प्रकार की धोती बुनना शुरू किया, जिसके किनारे पर 'खुदीराम' लिखा होता था। बंगाल के नौजवान बड़े गर्व से इसे पहनते थे।

लोकगीत: उनकी शहादत पर कई लोकगीत लिखे गए जो आज भी बंगाल के घर-घर में गाए जाते हैं।

निष्कर्ष

खुदीराम बोस महज एक क्रांतिकारी नहीं, बल्कि उस अटूट संकल्प का नाम हैं जिसने ब्रिटिश साम्राज्य की नींव हिला दी थी। उनकी कम उम्र और बड़ा बलिदान आज भी भारतीय युवाओं को प्रेरित करता है कि राष्ट्रभक्ति के लिए उम्र की कोई सीमा नहीं होती।

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