शहीद उधम सिंह की बायोग्राफी

 स्वतंत्रता सेनानी शहीद उधम सिंह का नाम भारतीय स्वतंत्रता संग्राम के इतिहास में स्वर्णाक्षरों में अंकित है। वे एक ऐसे क्रांतिकारी थे जिन्होंने जलियांवाला बाग हत्याकांड के मुख्य दोषी से बदला लेने के लिए 21 वर्षों तक धैर्यपूर्वक प्रतीक्षा की और सात समंदर पार लंदन जाकर अपने लक्ष्य को पूरा किया।

यहाँ उनके जीवन, संघर्ष और शहादत का विस्तृत विवरण दिया गया है:

1. प्रारंभिक जीवन और संघर्ष (1899-1919)

उधम सिंह का जन्म 26 दिसंबर 1899 को पंजाब के संगरूर जिले के सुनाम गांव में हुआ था। उनके बचपन का नाम शेर सिंह था। उनके पिता, सरदार टहल सिंह जम्मु, रेलवे में एक चौकीदार थे।

अनाथालय का सफर

उधम सिंह का शुरुआती जीवन दुखों से भरा रहा। जब वे मात्र दो वर्ष के थे, तब उनकी माता का देहांत हो गया और 1907 में उनके पिता भी चल बसे। इसके बाद उन्हें और उनके बड़े भाई मुक्ता सिंह को अमृतसर के सेंट्रल खालसा अनाथालय में शरण लेनी पड़ी। अनाथालय में ही उन्हें 'उधम सिंह' नाम मिला।

2. जलियांवाला बाग हत्याकांड: जीवन का निर्णायक मोड़

13 अप्रैल 1919 की घटना ने उधम सिंह के जीवन की दिशा बदल दी। बैसाखी के दिन, जनरल डायर के आदेश पर ब्रिटिश सेना ने जलियांवाला बाग में निहत्थे लोगों पर गोलियां चलाईं। उधम सिंह उस समय वहां पानी पिलाने की सेवा कर रहे थे।

उन्होंने अपनी आँखों के सामने सैकड़ों निर्दोष भारतीयों को दम तोड़ते देखा। इस नरसंहार का उन पर इतना गहरा प्रभाव पड़ा कि उन्होंने उसी समय बाग की रक्त-रंजित मिट्टी हाथ में लेकर कसम खाई कि वे इस नरसंहार के मुख्य सूत्रधार माइकल ओ'डायर (जो उस समय पंजाब का गवर्नर था) को मार डालेंगे।

3. क्रांतिकारी गतिविधियों में प्रवेश और विदेश यात्रा

नरसंहार के बाद, उधम सिंह क्रांतिकारी राजनीति में सक्रिय हो गए। वे गदर पार्टी के संपर्क में आए और क्रांतिकारी गतिविधियों के लिए धन और हथियार जुटाने के उद्देश्य से कई देशों की यात्रा की।

1924: वे दक्षिण अफ्रीका, ब्राजील और अमेरिका गए।

1927: भगत सिंह के कहने पर वे भारत लौटे, लेकिन उन्हें अवैध हथियार रखने के जुर्म में 5 साल की जेल हो गई।

जेल से रिहाई: 1931 में जेल से छूटने के बाद, उन्होंने पाया कि उनका घर पुलिस की निगरानी में है। वे गुप्त रूप से कश्मीर के रास्ते जर्मनी और फिर 1934 में लंदन पहुँच गए।

4. लंदन में 'मिशन' की तैयारी

लंदन में उधम सिंह ने अपनी पहचान छिपाने के लिए 'राम मोहम्मद सिंह आज़ाद' नाम अपनाया। यह नाम भारत की धार्मिक एकता का प्रतीक था (हिंदू, मुस्लिम, सिख और आज़ाद)। उन्होंने वहां कई छोटी-मोटी नौकरियां कीं और माइकल ओ'डायर की गतिविधियों पर नज़र रखनी शुरू की।

5. प्रतिशोध: 13 मार्च 1940

आखिरकार, 21 साल के लंबे इंतजार के बाद वह दिन आया। लंदन के कैक्सटन हॉल में 'रॉयल सेंट्रल एशियन सोसाइटी' की बैठक हो रही थी, जहाँ माइकल ओ'डायर भाषण देने वाला था।

उधम सिंह ने अपनी बंदूक को एक किताब के भीतर छिपाया था। जैसे ही ओ'डायर अपना भाषण समाप्त कर मंच से उतरने लगा, उधम सिंह ने उन पर गोलियां चला दीं। ओ'डायर की मौके पर ही मौत हो गई। उधम सिंह ने भागने की कोशिश नहीं की और शांति से अपनी गिरफ्तारी दे दी।

6. मुकदमा और शहादत

जेल में रहने के दौरान उन्होंने भूख हड़ताल की। मुकदमे के दौरान उन्होंने गर्व से कहा:

"मैंने उसे मार दिया क्योंकि वह इसी के लायक था। वह मेरा असली दुश्मन था। उसने मेरे देश के गौरव को कुचला था।"

31 जुलाई 1940 को लंदन की पेंटनविले जेल में उन्हें फांसी दे दी गई। 1974 में भारत सरकार उनके अवशेषों को वापस लाई और पूरे सम्मान के साथ उनके पैतृक गांव सुनाम में उनका अंतिम संस्कार किया गया।

उधम सिंह की विरासत का महत्व

सांप्रदायिक एकता: उन्होंने 'राम मोहम्मद सिंह आज़ाद' नाम रखकर यह संदेश दिया कि आज़ादी की लड़ाई में धर्म की कोई दीवार नहीं है।

धैर्य की पराकाष्ठा: 21 साल तक अपने लक्ष्य के प्रति समर्पित रहना उनकी अदम्य इच्छाशक्ति को दर्शाता है।

वैश्विक क्रांतिकारी: उन्होंने दिखाया कि भारतीय क्रांतिकारी विदेशी धरती पर भी न्याय मांग सकते हैं।

टिप्पणियाँ

इस ब्लॉग से लोकप्रिय पोस्ट

खुदीराम बोस - Biography

Huma Khan biography

Online earning from mobile