रामप्रसाद बिस्मिल - Biography


 

राम प्रसाद बिस्मिल भारतीय स्वतंत्रता संग्राम के उन महान क्रांतिकारियों में से एक थे, जिन्होंने अपनी कलम और पिस्तौल दोनों से ब्रिटिश साम्राज्य की नींव हिला दी थी। वे केवल एक योद्धा ही नहीं, बल्कि एक उच्च कोटि के कवि, लेखक और अनुवादक भी थे।

यहाँ उनके जीवन का विस्तृत परिचय दिया गया है:

1. जन्म और प्रारंभिक जीवन

राम प्रसाद बिस्मिल का जन्म 11 जून 1897 को उत्तर प्रदेश के शाहजहाँपुर जिले में हुआ था। उनके पिता का नाम मुरलीधर और माता का नाम मूलमती था। उनके पिता नगरपालिका में काम करते थे।

बिस्मिल का बचपन अभावों में बीता, लेकिन उनकी माता के संस्कारों ने उन्हें बहुत प्रभावित किया। उन्होंने हिंदी और उर्दू की शिक्षा प्राप्त की। शुरुआत में उनका मन पढ़ाई में कम और बुरी आदतों (जैसे सिगरेट पीना) में अधिक लगता था, लेकिन स्वामी दयानंद सरस्वती की पुस्तक 'सत्यार्थ प्रकाश' पढ़ने के बाद उनके जीवन में क्रांतिकारी परिवर्तन आया। वे ब्रह्मचर्य का पालन करने लगे और देश सेवा की ओर अग्रसर हुए।

2. क्रांतिकारी विचारधारा का उदय

बिस्मिल के भीतर देशभक्ति की लौ तब प्रज्वलित हुई जब 1916 में कांग्रेस के लखनऊ अधिवेशन के दौरान उन्होंने गरम दल के नेताओं के प्रति नरम दल के व्यवहार को देखा। वे आर्य समाज से गहराई से जुड़े थे, जहाँ उन्हें राष्ट्र के प्रति उनके कर्तव्यों का बोध हुआ।

उन्होंने 'मातृवेदी' नामक एक संगठन की स्थापना की और क्रांतिकारी साहित्य के माध्यम से युवाओं को जागरूक करना शुरू किया। उनकी पहली कविता 'मेरा जन्म' उनकी माता के प्रति उनके समर्पण को दर्शाती है।

3. प्रमुख क्रांतिकारी गतिविधियाँ

मैनपुरी षड्यंत्र (1918)

बिस्मिल ने अपनी क्रांतिकारी गतिविधियों के लिए धन जुटाने हेतु सरकारी खजाने को लूटने की योजना बनाई। मैनपुरी में उन्होंने कुछ युवाओं के साथ मिलकर इस अभियान को अंजाम दिया। इसके बाद ब्रिटिश पुलिस ने उन्हें पकड़ने के लिए काफी प्रयास किए, लेकिन वे भूमिगत हो गए और कई वर्षों तक वेश बदलकर चंबल के जंगलों में रहे। इसी समय के दौरान उन्होंने अपनी प्रसिद्ध रचनाएँ लिखीं।

हिंदुस्तान रिपब्लिकन एसोसिएशन (HRA)

1924 में, बिस्मिल ने सचिंद्रनाथ सान्याल और योगेश चंद्र चटर्जी के साथ मिलकर 'हिंदुस्तान रिपब्लिकन एसोसिएशन' (HRA) का गठन किया। बाद में इसमें भगत सिंह और चंद्रशेखर आजाद जैसे युवा क्रांतिकारी भी शामिल हुए। इस संगठन का मुख्य उद्देश्य सशस्त्र क्रांति के माध्यम से भारत को स्वतंत्र कराना था।

काकोरी कांड (9 अगस्त 1925)

क्रांतिकारी गतिविधियों को चलाने के लिए हथियारों और धन की आवश्यकता थी। बिस्मिल ने अपने साथियों के साथ मिलकर शाहजहाँपुर से लखनऊ जा रही '8-डाउन' ट्रेन को काकोरी नामक स्थान पर रोका और सरकारी खजाने को लूट लिया। यह घटना इतिहास में 'काकोरी कांड' के नाम से प्रसिद्ध हुई।

4. लेखन और साहित्यिक योगदान

बिस्मिल एक महान साहित्यकार थे। उन्होंने 'राम', 'अज्ञात' और 'बिस्मिल' उपनामों से कविताएँ लिखीं। उनकी रचनाओं ने देशवासियों के भीतर देशप्रेम का ज्वार पैदा कर दिया।

सरफरोशी की तमन्ना: हालाँकि इस गजल के मूल रचयिता 'बिस्मिल अजीमाबादी' थे, लेकिन इसे राम प्रसाद बिस्मिल ने जेल के भीतर गाकर अमर कर दिया।

आत्मकथा: उन्होंने जेल में रहते हुए अपनी आत्मकथा लिखी, जो आज भी क्रांतिकारियों के लिए प्रेरणा का स्रोत है।

अनुवाद: उन्होंने 'बोल्शेविकों की करतूत' जैसी कई पुस्तकों का अनुवाद भी किया।

5. शहादत: एक अमर बलिदान

काकोरी कांड के बाद ब्रिटिश सरकार ने बड़े पैमाने पर गिरफ्तारियाँ कीं। अंततः बिस्मिल, अशफाक उल्ला खान, रोशन सिंह और राजेंद्र लाहिड़ी को फांसी की सजा सुनाई गई।

19 दिसंबर 1927 को गोरखपुर जेल में उन्हें फांसी के फंदे पर लटका दिया गया। फांसी के तख्ते की ओर बढ़ते हुए उन्होंने गर्व से नारा लगाया— "वंदे मातरम!" और "भारत माता की जय!"।

"मालिक तेरी रज़ा रहे और तू ही तू रहे,

बाकी न मैं रहूँ न मेरी आरज़ू रहे।"

निष्कर्ष

राम प्रसाद बिस्मिल का जीवन हमें सिखाता है कि राष्ट्र के लिए बलिदान देना सर्वोच्च धर्म है। उन्होंने हिंदू-मुस्लिम एकता की मिसाल पेश की (विशेषकर अशफाक उल्ला खान के साथ उनकी मित्रता)। उनका त्याग और उनके शब्द आज भी भारतीय युवाओं के दिलों में गूँजते हैं।

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